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गिनती संस्कृत में counting in sanskrit

गिनती संस्कृत में

अंक हिन्‍दी संस्‍कृत अंग्रेजी
एक एकम् One
दो द्वे Two
तीन त्रीणि Three
चार चत्‍वारि Four
पांच पंच Five
छ: षड् Six
सात सप्‍त Seven
आठ अष्‍ट Eight
नव नव Nine
१० दस दश Ten
English Numerals Hindi Sanskrit
One 1 एक एकः
Two 2 दो द्वौ
Three 3 तीन त्रयः
Four 4 चार चत्वारः
Five 5 पाञ्च पञ्च
Six 6 छे षट्
Seven 7 सात सप्त
Eight 8 आठ अष्ट
Nine 9 नौ नव
Ten 10 दस दश
Eleven 11 ग्यारह एकादशन्
Twelve 12 बारह द्वादशन्
Thirteen 13 तेरह त्रयोदशन्
Fourteen 14 चौदह चतुर्दशन्
Fifteen 15 पन्द्रह पञ्चदशन्
Sixteen 16 सोलह षोडशन्
Seventeen 17 सत्रह सप्तदशन्
Eighteen 18 अठारह अष्टादशन्
Nineteen 19 उन्नीस नवदशन्, एकोनविंशति, ऊनविंशति, एकान्नविंशति
Twenty 20 बीस विंशति
Twenty-one 21 इक्कीस एकाविंशति
Twenty-two 22 बाईस द्वाविंशति
Twenty-three 23 तेईस त्रयोविंशति
Twenty-four 24 चौबीस चतुर्विंशति
Twenty-five 25 पच्चीस पञ्चविंशति
Twenty-six 26 छब्बीस षड्विंशति
Twenty-seven 27 सत्तइस सप्तविंशति
Twenty-eight 28 अठ्ठाइस अष्टाविंशति
Twenty-nine 29 उन्तीस नवविंशति, एकोनात्रिंशत्, ऊनत्रिंशत्, एकान्नत्रिंशत्
Thirty 30 तीस त्रिंशत्
Thirty-one 31 इकतीस एकत्रिंशत्
Thirty-two 32 बत्तीस द्वात्रिंशत्
Thirty-three 33 तेतीस त्रयत्रिंशत्
Thirty-four 34 चौतीस चतुस्त्रिंशत्
Thirty-five 35 पैंतीस पञ्चत्रिंशत्
Thirty-six 36 छत्तीस षट्त्रिंशत्
Thirty-seven 37 सैंतीस सप्तत्रिंशत्
Thirty-eight 38 अड़तीस अष्टात्रिंशत्
Thirty-nine 39 अन्तालीस एकोनचत्वारिंशत्
Forty 40 चालीस चत्वारिंशत्
Forty-one 41 इकतालीस एकचत्वारिंशत्
Forty-two 42 ब्यालीस द्विचत्वारिंशत्, द्वाचत्वारिंशत्
Forty-three 43 तेतालीस त्रिचत्वारिंशत्, त्रयश्चत्वारिंशत्
Forty-four 44 चौवालीस चतुश्चत्वारिंशत्
Forty-five 45 पैंतालीस पञ्चचत्वारिंशत्
Forty-six 46 छ्यालीस षट्चत्वारिंशत्
Forty-seven 47 सैतालीस सप्तचत्वारिंशत्
Forty-eight 48 अड़तालीस अष्टचत्वारिंशत्, अष्टाचत्वारिंशत्
Forty-nine 49 उनंचास एकोनपञ्चाशत्
Fifty 50 पचास पञ्चाशत्
Fifty-one 51 इक्यावन एकपञ्चाशत्
Fifty-two 52 बावन द्विपञ्चाशत्
Fifty-three 53 त्रेपन त्रिपञ्चाशत्
Fifty-four 54 चौअन चतुःपञ्चाशत्
Fifty-five 55 पचपन पञ्चपञ्चाशत्
Fifty-six 56 छप्पन षट्पञ्चाशत्
Fifty-seven 57 सत्तावन सप्तपञ्चाशत्
Fifty-eight 58 अठ्ठावन अष्टपञ्चाशत्
Fifty-nine 59 उनसठ एकोनषष्ठिः
Sixty 60 साठ षष्ठिः
Sixty-one 61 इकसठ एकषष्ठिः
Sixty-two 62 बासठ द्विषष्ठिः
Sixty-three 63 त्रेसठ त्रिषष्ठिः
Sixty-four 64 चौंसठ चतुःषष्ठिः
Sixty-five 65 पैंसठ पञ्चषष्ठिः
Sixty-six 66 छ्यासठ षट्षष्ठिः
Sixty-seven 67 सरसठ सप्तषष्ठिः
Sixty-eight 68 अरसठ अष्टषष्ठिः
Sixty-nine 69 उनहत्तर एकोनसप्ततिः
Seventy 70 सत्तर सप्ततिः
Seventy-one 71 इकहत्तर एकसप्ततिः
Seventy-two 72 बहत्तर द्विसप्ततिः
Seventy-three 73 तिहत्तर त्रिसप्ततिः
Seventy-four 74 चौहत्तर चतुःसप्ततिः
Seventy-five 75 पिचत्तर पञ्चसप्ततिः
Seventy-six 76 छियत्तर षट्सप्ततिः
Seventy-seven 77 सतत्तर सप्तसप्ततिः
Seventy-eight 78 अठत्तर अष्टसप्ततिः
Seventy-nine 79 उनासी एकोनाशीतिः
Eighty 80 अस्सी अशीतिः
Eighty-one 81 इक्यासी एकाशीतिः
Eighty-two 82 ब्यासी द्वशीतिः
Eighty-three 83 तिरासी त्र्यशीतिः
Eighty-four 84 चौरासी चतुरशीतिः
Eighty-five 85 पिचासी पञ्चाशीतिः
Eighty-six 86 छयासी षडशीतिः
Eighty-seven 87 सतासी सप्ताशीतिः
Eighty-eight 88 अठासी अष्टाशीतिः
Eighty-nine 89 नवासी एकोननवतिः
Ninety 90 नब्बे नवतिः
Ninety-one 91 इक्यानवे एकनवतिः
Ninety-two 92 बानवे द्विनवतिः
Ninety-three 93 त्रानवे त्रिनवतिः
Ninety-four 94 चौरानवे चतुर्नवतिः
Ninety-five 95 पिञ्चानवे पञ्चनवतिः
Ninety-six 96 छ्यानवे षण्णवतिः
Ninety-seven 97 सत्तानवे सप्तनवतिः
Ninety-eight 98 अठ्ठानवे अष्टनवतिः
Ninety-Nine 99 निन्यानवे एकोनशतम्
Hundred 100 सौ शतम्

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Posted by admin - February 2, 2016 at 1:46 pm

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GURU GORAKH NATH JI KI KATHA

GURU GORAKH NATH JI KI KATHA

महायोगी गोरखनाथ मध्ययुग (11वीं शताब्दी अनुमानित) के एक विशिष्ट महापुरुष थे। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे। इन दोनों ने नाथ सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित कर इसका विस्तार किया। इस सम्प्रदाय के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है।

गुरु गोरखनाथ हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथ समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर माँ पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है। इन्हें चैरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इनके उपदेशों में योग और शैव तंत्रों का सामंजस्य है। ये नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय प्राप्त है। इनकी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को अधिक महत्व दिया है। गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात् समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

गोरखनाथ या गोरक्षनाथ जी महाराज ११वी से १२वी शताब्दी के नाथ योगी थे। गुरु गोरखनाथ जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और अनेकों ग्रन्थों की रचना की। गोरखनाथ जी का मन्दिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर मे स्थित है। गोरखनाथ के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गुरु गोरखनाथ जी के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया। नेपाल में एक जिला है गोरखा, उस जिले का नाम गोरखा भी इन्ही के नाम से पड़ा। माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ सबसे पहले यही दिखे थें। गोरखा जिला में एक गुफा है जहाँ गोरखनाथ का पग चिन्ह है और उनकी एक मूर्ति भी है। यहाँ हर साल वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव मनाया जाता है जिसे रोट महोत्सव कहते है और यहाँ मेला भी लगता है।

डॉ० बड़थ्वाल की खोज में निम्नलिखित ४० पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है। डॉ० बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम १४ ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला। तेरहवीं पुस्तक ‘ग्यान चैंतीसा’ समय पर न मिल सकने के कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ सकी, परंतु बाकी तेरह को गोरखनाथ की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया है। पुस्तकें ये हैं-
1. सबदी  2. पद  3.शिष्यादर्शन  4. प्राण सांकली  5. नरवै बोध  6. आत्मबोध7. अभय मात्रा जोग 8. पंद्रह तिथि  9. सप्तवार  10. मंछिद्र गोरख बोध  11. रोमावली12. ग्यान तिलक  13. ग्यान चैंतीसा  14. पंचमात्रा   15. गोरखगणेश गोष्ठ 16.गोरखदत्त गोष्ठी (ग्यान दीपबोध)  17.महादेव गोरखगुष्टिउ 18. शिष्ट पुराण   19. दया बोध 20.जाति भौंरावली (छंद गोरख)  21. नवग्रह   22. नवरात्र  23 अष्टपारछ्या  24. रह रास  25.ग्यान माला  26.आत्मबोध (2)   27. व्रत   28. निरंजन पुराण   29. गोरख वचन 30. इंद्र देवता   31.मूलगर्भावली  32. खाणीवाणी  33.गोरखसत   34. अष्टमुद्रा  35. चौबीस सिध  36 षडक्षर  37. पंच अग्नि  38 अष्ट चक्र   39 अ���ूक 40. काफिर बोध

 

 

मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के समय के बारे में इस देश में अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार की बातें कही हैं। वस्तुतः इनके और इनके समसामयिक सिद्ध जालंधरनाथ और कृष्णपाद के संबंध में अनेक दंतकथाएँ प्रचलित हैं। नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोरक्षनाथ जी के बारे में लिखित उल्लेख हमारे पुराणों में भी मिलते है। विभिन्न पुराणों में इससे संबंधित कथाएँ मिलती हैं। इसके साथ ही साथ बहुत सी पारंपरिक कथाएँ और किंवदंतियाँ भी समाज में प्रसारित है। उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, बंगाल, पश्चिमी भारत, सिंध तथा पंजाब में और भारत के बाहर नेपाल में भी ये कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों का वर्णन यहाँ किया जा रहा हैं।

1. गोरक्षनाथ जी के आध्यात्मिक जीवन की शुरूआत से संबंधित कथाएँ विभिन्न स्थानों में पाई जाती हैं। इनके गुरू के संबंध में विभिन्न मान्यताएँ हैं। परंतु सभी मान्यताएँ उनके दो गुरूओं के होने के बारे में एकमत हैं। ये थे-आदिनाथ और मत्स्येंद्रनाथ। चूंकि गोरक्षनाथ जी के अनुयायी इन्हें एक दैवी पुरूष मानते थे, इसीलिये उन्होनें इनके जन्म स्थान तथा समय के बारे में जानकारी देने से हमेशा इन्कार किया। किंतु गोरक्षनाथ जी के भ्रमण से संबंधित बहुत से कथन उपलब्ध हैं। नेपालवासियों का मानना हैं कि काठमांडू में गोरक्षनाथ का आगमन पंजाब से या कम से कम नेपाल की सीमा के बाहर से ही हुआ था। ऐसी भी मान्यता है कि काठमांडू में पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही उनका निवास था। कहीं-कहीं इन्हें अवध का संत भी माना गया है।

2. नाथ संप्रदाय के कुछ संतो का ये भी मानना है कि संसार के अस्तित्व में आने से पहले उनका संप्रदाय अस्तित्व में था। इस मान्यता के अनुसार संसार की उत्पत्ति होते समय जब विष्णु कमल से प्रकट हुए थे, तब गोरक्षनाथ जी पटल में थे। भगवान विष्णु जम के विनाश से भयभीत हुए और पटल पर गये और गोरक्षनाथ जी से सहायता मांगी। गोरक्षनाथ जी ने कृपा की और अपनी धूनी में से मुट्ठी भर भभूत देते हुए कहा कि जल के ऊपर इस भभूति का छिड़काव करें, इससे वह संसार की रचना करने में समर्थ होंगे। गोरक्षनाथ जी ने जैसा कहा, वैस ही हुआ और इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश श्री गोर-नाथ जी के प्रथम शिष्य बने।
3. एक मानव-उपदेशक से भी ज्यादा श्री गोरक्षनाथ जी को काल के साधारण नियमों से परे एक ऐसे अवतार के रूप में देखा गया जो विभिन्न कालों में धरती के विभिन्न स्थानों पर प्रकट हुए। सतयुग में वह लाहौर पार पंजाब के पेशावर में रहे, त्रेतायुग में गोरखपुर में निवास किया, द्वापरयुग में द्वारिका के पार भुज में और कलियुग में पुनः गोरखपुर के पश्चिमी काठियावाड़ के गोरखमढ़ी(गोरखमंडी) में तीन महीने तक यात्रा की।
4.एक मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को श्री गोरक्षनाथ जी का गुरू कहा जाता है। कबीर गोरक्षनाथ की गोरक्षनाथ जी की गोष्ठी  में उन्होनें अपने आपको मत्स्येंद्रनाथ से पूर्ववर्ती योगी थे, किन्तु अब उन्हें और शिव को एक ही माना जाता है और इस नाम का प्रयोग भगवान शिव अर्थात् सर्वश्रेष्ठ योगी के संप्रदाय को उद्गम के संधान की कोशिश के अंतर्गत किया जाता है।

5. गोरक्षनाथ के करीबी माने जाने वाले मत्स्येंद्रनाथ में मनुष्यों की दिलचस्पी ज्यादा रही हैं। उन्हें नेपाल के शासकों का अधिष्ठाता कुल गुरू माना जाता हैं। उन्हें बौद्ध संत (भिक्षु) भी माना गया है,जिन्होनें आर्यावलिकिटेश्वर के नाम से पदमपाणि का अवतार लिया। उनके कुछ लीला स्थल नेपाल राज्य से बाहर के भी है और कहा जाता है लि भगवान बुद्ध के निर्देश पर वो नेपाल आये थे। ऐसा माना जाता है कि आर्यावलिकटेश्वर पद्मपाणि बोधिसत्व ने शिव को योग की शिक्षा दी थी। उनकी आज्ञानुसार घर वापस लौटते समय समुद्र के तट पर शिव पार्वती को इसका ज्ञान दिया था। शिव के कथन के बीच पार्वती को नींद आ गयी, परन्तु मछली (मत्स्य) रूप धारण किये हुये लोकेश्वर ने इसे सुना। बाद में वहीं मत्स्येंद्रनाथ के नाम से जाने गये।

6. एक अन्य मान्यता के अनुसार श्री गोरक्षनाथ के द्वारा आरोपित बारह वर्ष से चले आ रहे सूखे से नेपाल की रक्षा करने के लिये मत्स्येंद्रनाथ को असम के कपोतल पर्वत से बुलाया गया था।

7.एक मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को हिंदू परंपरा का अंग माना गया है। सतयुग में उधोधर नामक एक परम सात्विक राजा थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनका दाह संस्कार किया गया परंतु उनकी नाभि अक्षत रही। उनके शरीर के उस अनजले अंग को नदी में प्रवाहित कर दिया गया, जिसे एक मछली ने अपना आहार बना लिया। तदोपरांत उसी मछ्ली के उदर से मत्स्येंद्रनाथ का जन्म हुआ। अपने पूर्व जन्म के पुण्य के फल के अनुसार वो इस जन्म में एक महान संत बने।

8.एक और मान्यता के अनुसार एक बार मत्स्येंद्रनाथ लंका गये और वहां की महारानी के प्रति आसक्त हो गये। जब गोरक्षनाथ जी ने अपने गुरु के इस अधोपतन के बारे में सुना तो वह उनकी तलाश मे लंका पहुँचे। उन्होंने मत्स्येंद्रनाथ को राज दरबार में पाया और उनसे जवाब मांगा । मत्स्येंद्रनाथ ने रानी को त्याग दिया,परंतु रानी से उत्पन्न अपने दोनों पुत्रों को साथ ले लिया। वही पुत्र आगे चलकर पारसनाथ और नीमनाथ के नाम से जाने गये,जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की।

9.एक नेपाली मान्यता के अनुसार, मत्स्येंद्रनाथ ने अपनी योग शक्ति के बल पर अपने शरीर का त्याग कर उसे अपने शिष्य गोरक्षनाथ की देखरेख में छोड़ दिया और तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त हुए और एक राजा के शरीर में प्रवेश किया। इस अवस्था में मत्स्येंद्रनाथ को काम और सेक्स का लोभ हो आया। भाग्यवश अपने गुरु के शरीर को देखरेख कर रहे गोरक्षनाथ जी उन्हें चेतन अवस्था में वापस लाये और उनके गुरु अपने शरीर में वापस लौट आयें।

10. संत कबीर पंद्रहवीं शताब्दी के भक्त कवि थे। इनके उपदेशों से गुरुनानक भी लाभान्वित हुए थे। संत कबीर को भी गोरक्षनाथ जी का समकालीन माना जाता हैं। गोरक्षनाथ जी की एक गोष्ठी में कबीर और गोरक्षनाथ के शास्त्रार्थ का भी वर्णन है। इस आधार पर इतिहासकर विल्सन गोरक्षनाथ जी को पंद्रहवीं शताब्दी का मानते हैं।

11. पंजाब में चली आ रही एक मान्यता के अनुसार राजा रसालु और उनके सौतेले भाई पूरनमल भगत भी गोरक्षनाथ से संबंधित थे। रसालु का यश अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक फैला हुआ था और पूरनमल पंजाब के एक प्रसिद्ध संत थे। ये दोनों ही गोरक्षनाथ जी के शिष्य बने और पूरनमल तो एक प्रसिद्ध योगी बने। जिस कुँए के पास पूरनमल वर्षो तक रहे, वह आज भी सियालकोट में विराजमान है। रसालु सियालकोट के प्रसिद्ध सालवाहन के पुत्र थे।

12. बंगाल से लेकर पश्चिमी भारत तक और सिंध से राजस्थान  पंजाब में गोपीचंद भरथरी , रानी पिंगला और राजा भर्तृहरि से जुड़ी एक और मान्यता भी है। इसके अनुसार गोपीचंद की माता मानवती को भर्तृहरि की बहन माना जाता है। भर्तृहरि ने अपनी पत्नी रानी पिंगला की मृत्यु के पश्चात् अपनी राजगद्दी अपने भाई उज्जैन के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (चंन्द्रगुप्त द्वितीय) के नाम कर दी थी। भर्तृहरि बाद में गोरक्षनाथ के परमप्रिय शिष्य बन गये थे।

विभिन्न मान्यताओं को तथा तथ्यों को ध्यान में रखते हुये ये निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गोरक्षनाथ जी का जीवन काल तेरहवीं शताब्दी से पहले का नहीं था। गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ-विषयक समस्त कहानियों के अनुशीलन से कई बातें स्पष्ट रूप से जानी जा सकती हैं। प्रथम यह कि मत्स्येंद्रनाथ और जलधरनाथ समसमायिक थे दूसरी यह कि मत्स्येंद्रनाथ गोरखनाथ के गुरु थे और जालांधरनाथ कानुपा या कृष्णपाद के गुरु थे,तीसरी यह की मत्स्येंद्रनाथ कभी योग-मार्ग के प्रवर्तक थे,फिर संयोगवश ऐसे एक आचार-विचार  में सम्मिलित हो गए थे जिसमें स्त्रियों के साथ अबाध सेक्स संसर्ग मुख्य बात थी – संभवतः यह वामाचारी यौनसुखी साधना थी-चौथी यह कि शुरू से ही जालांधरनाथ और कानिपा की साधना-पद्धति मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ की साधना-पद्धति से भिन्न थी। यह स्पष्ट है कि किसी एक का समय भी मालूम हो तो बाकी सिद्धों के समय का पता आसानी से लग जाएगा। समय मालूम करने के लिए कई युक्तियाँ दी जा सकती हैं। एक-एक करके हम उन पर विचार करें।

(1) सबसे प्रथम तो मत्स्येंद्रनाथ द्वारा लिखित ‘कौल ज्ञान निर्णय’ ग्रंथ (कलकत्ता संस्कृत सीरीज में डॉ० प्रबोधचंद्र वागची द्वारा 1934 ई० में संपादित) का लिपिकाल निश्चित रूप से सिद्घ कर देता है कि मत्स्येंद्रनाथ ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्ववर्ती हैं।

(2) सुप्रसिद्ध कश्मीरी आचार्य अभिनव गुप्त ने अपने तंत्रालोक में मच्छंद विभु को नमस्कार किया है। ये ‘मच्छंद विभु’ मत्स्येंद्रनाथ ही हैं, यह भी निश्चित है। अभिनव गुप्त का समय निश्चित रूप से ज्ञात है। उन्होंने ईश्वर प्रत्याभिज्ञा की बृहती वृत्ति सन् 1015 ई० में लिखी थी और क्रम स्त्रोत की रचना सन् 991 ई० में की थी। इस प्रकार अभिनव गुप्त सन् ईसवी की दसवीं शताब्दी के अंत में और ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में वर्तमान थे। मत्स्येंद्रनाथ इससे पूर्व ही आविर्भूत हुए होंगे। जिस आदर और गौरव के साथ आचार्य अभिनव गुप्तपाद ने उनका स्मरण किया है उससे अनुमान किया जा सकता है कि उनके पर्याप्त पूर्ववर्ती होंगे।

(3) पंडित राहुल सांकृत्यायन ने गंगा के पुरातत्त्वांक में 84 वज्रयानी सिद्धों की सूची प्रकाशित कराई है। इसके देखने से मालूम होता है कि मीनपा नामक सिद्ध, जिन्हें तिब्बती परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ का पिता कहा गया है पर वे वस्तुतः मत्स्येंद्रनाथ से अभिन्न हैं, राजा देवपाल के राज्यकाल में हुए थे। राजा देवपाल 809-49 ई० तक राज करते रहे (चतुराशीत सिद्ध प्रवृत्ति, तन्जूर 86।1। कार्डियर, पृ० 247)। इससे यह सिद्ध होता है कि मत्स्येंद्रनाथ नवीं शताब्दी के मध्य के भाग में और अधिक से अधिक अंत्य भाग तक वर्तमान थे।

(4) गोविंदचंद्र या गोपीचंद्र भरथरी  का संबंध जालंधरपाद से बताया जाता है। वे कानिफा के शिष्य होने से जालंधरपाद की तीसरी पुश्त में पड़ते हैं। इधर तिरुमलय की शैललिपि से यह तथ्य उदधृत किया जा सका है कि दक्षिण के राजा राजेंद्र चोल ने मणिकचंद्र को पराजित किया था। बंगला में ‘गोविन्द चंजेंद्र चोल ने मणिकचंद्र के पुत्र गोविंदचंद्र को पराजित किया था। बंगला में ‘गोविंद चंद्रेर गान’ नाम से जो पोथी उपलब्ध हुई है, उसके अनुसार भी गोविंदचंद्र का किसी दाक्षिणात्य राजा का युद्ध वर्णित है। राजेंद्र चोल का समय 1063 ई० -1112 ई० है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि गोविंदचंद्र ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य भाग में वर्तमान थे। यदि जालंधर उनसे सौ वर्ष पूर्ववर्ती हो तो भी उनका समय दसवीं शताब्दी के मध्य भाग में निश्चित होता है। मत्स्येंद्रनाथ का समय और भी पहले निश्चित हो चुका है। जालंधरपाद उनके समसामयिक थे। इस प्रकार अनेक कष्ट-कल्पना के बाद भी इस बात से पूर्ववर्ती प्रमाणों की अच्छी संगति नहीं बैठती है।

(5) वज्रयानी सिद्ध कण्हपा (कानिपा, कानिफा, कान्हूपा) ने स्वयं अपने गानों पर जालंधरपाद का नाम लिया है। तिब्बती परंपरा के अनुसार ये भी राजा देवपाल (809-849 ई०) के समकालीन थे। इस प्रकार जालंधरपाद का समय इनसे कुछ पूर्व ठहराव है।

(6) कंथड़ी नामक एक सिद्धि के साथ गोरखनाथ का संबंध बताया जाता है। ‘प्रबंध चिंतामणि’ में एक कथा आती है कि चैलुक्य राजा मूलराज ने एक मूलेश्वर नाम का शिवमंदिर बनवाया था। सोमनाथ ने राजा के नित्य नियत वंदन-पूजन से संतुष्ट होकर अणहिल्लपुर में अवतीर्ण होने की इच्छा प्रकट की। फलस्वरूप राजा ने वहाँ त्रिपुरुष-प्रासाद नामक मंदिर बनवाया। उसका प्रबंधक होने के लिए राजा ने कंथड़ी नामक शैवसिद्ध से प्रर्थना की। जिस समय राजा उस सिद्ध से मिलने गया उस समय सिद्ध को बुखार था, पर अपने बुखार को उसने कंथा में संक्रामित कर दिया। कंथा काँपने लगी। राजा ने पूछा तो उसने बताया कि उसी ने कंथा में ज्वर संक्रमित कर दिया है। बड़े छल-बल से उस निःस्पृह तपस्वी को राजा ने मंदिर का प्रबंधक बनवाया। कहानी में सिद्ध के सभी लक्षण नागपंथी योगी के हैं, इसलिए यह कंथड़ी निश्चय ही गोरखनाथ के शिष्य ही होंगे। ‘प्रबंध चिंतामणि’ की सभी प्रतियों में लिखा है कि मूलराज ने संवत् 993 की आषाढ़ी पूर्णिमा को राज्यभार ग्रहण किया था। केवल एक प्रति में 998 संवत् है। इस हिसाब से जो काल अनुमान किया जा सकता है, वह पूर्ववर्ती प्रमाणों से निर्धारित तिथि के अनुकूल ही है। ये ही गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ का काल-निर्णय करने के ऐतिहासिक या अर्द्ध-ऐतिहासिक अधार हैं। परंतु प्रायः दंतकथाओं और सांप्रदायिक परंमपराओं के आधार पर भी काल-निर्णय का प्रयत्न किया जाता है।
इन दंतकथाओं से संबद्ध ऐतिहासिक व्यक्तियों का काल बहुत समय जाना हुआ रहता है। बहुत-से ऐतिहासिक व्यक्ति गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ  के साक्षात् शिष्य माने जाते हैं। उनके समय की सहायता से भी गोरखनाथ के समय का अनुमान लगाया जा सकता है। ब्रिग्स ने (‘गोरखनाथ एंड कनफटा योगीज’ कलकत्ता, 1938) इन दंतकथाओं पर आधारित काल और चार मोटे विभागों में इस प्रकार बाँट लिया है-

(1) कबीर,  नानक आदि के साथ गोरखनाथ का संवाद हुआ था, इस पर दंतकथाएँ भी हैं और पुस्तकें भी लिखी गई हैं। यदि इनसे गोरखनाथ का काल-निर्णय किया जाए, जैसा कि बहुत-से पंडितों ने भी किया है, तो चैदहवीं शताब्दी के ईषत् पूर्व या मध्य में होगा।

(2) गोगा की कहानी, पश्चिमी नाथों की अनुश्रुतियाँ, बँगाल की शैव-परंपरा और धर्मपूजा का संपद्राय, दक्षिण के पुरातत्त्व के प्रमाण, ज्ञानेश्वर की परंपरा आदि को प्रमाण माना जाए तो यह काल 1200 ई० के उधर ही जाता है। तेरहवीं शताब्दी में गोरखपुर का मठ ढहा दिया गया था, इसका ऐतिहासिक सबूत है, इसलिए निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गोरखनाथ 1200 ई० के पहले हुए थे। इस काल के कम से कम सौ वर्ष पहले तो यह काल होना ही चाहिए।

(3) नेपाल के शैव-बौद्ध परंपरा के नरेंद्रदेव, के बाप्पाराव, उत्तर-पश्चिम के रसालू और होदो, नेपाल के पूर्व में शंकराचार्य से भेंट आदि आधारित काल 8वीं शताब्दी से लेकर नवीं शताब्दी तक के काल का निर्देश करते हैं।

(4) कुछ परंपराएँ इससे भी पूर्ववर्ती तिथि की ओर संकेत करती हैं। ब्रिग्स दूसरी श्रेणी के प्रमाणों पर आधारित काल को उचित काल समझते हैं, पर साथ ही यह स्वीकार करते हैं कि यह अंतिम निर्णय नहीं है। जब तक और कोई प्रमाण नहीं मिल जाता तब तक वे गोरखनाथ के विषय में इतना ही कह सकते हैं कि गोरखनाथ 1200 ई० से पूर्व, संभवतः ग्यारहवीं शाताब्दी के आरंभ में, पूर्वी, बंगाल में प्रादुर्भुत हुए थे। परंतु सब मिलकर वे निश्चित रूप से जोर देकर कुछ नहीं कहते और जो काल बताते हैं, उसे अन्य प्रमाणों से अधिक युक्तिसंगत माना जाए, यह भी नहीं बताते। मैंने नाथ संप्रदाय में दिखाया है कि किस प्रकार गोरखनाथ के अनेक पूर्ववर्ती मत उनके द्वारा प्रवर्तित बारहपंथी संप्रदाय में अंतर्भुक्त हो गए थे। इन संप्रदायों के साथ उ���की अनेक अनुश्रुतियाँ और दंतकथाएं भी संप्रदाय में प्रविष्ट हुईं। इसलिए अनुश्रुतियों के आधार पर ही विचार करने वाले विद्वानों को कई प्रकार की परम्परा-विरोधी परंपराओं से टकराना पड़ता है।

परंतु ऊपर के प्रमाणों के आधार पर नाथमार्ग के आदि प्रवर्तकों का समय नवीं शताब्दी का मध्य भाग ही उचित जान पड़ता है। इस मार्ग में पूर्ववर्ती सिद्ध भी बाद में चलकर अंतर्भुक्त हुए हैं और इसलिए गोरखनाथ के संबंध में ऐसी दर्जनों दंतकाथाएँ चल पड़ी हैं, जिनको ऐतिहासिक तथ्य मान लेने पर तिथि-संबंधी झमेला खड़ा हो जाता है
गोरखनाथ के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथ आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथ जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथ के पास आकर पूछा, महाराज, आप क्यों रो रहे हैं? गोरखनाथ ने उसी तरह रोते हुए कहा, क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी। इस पर राजा ने कहा,  हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं। गोरखनाथ बोले, तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं।

तुम तो एक मृत स्त्री के कारण स्वयं  मरने के लिए तैयार बैठे हो। गोरखनाथ की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया। कहा जाता है कि राजकुमार बप्पा रावल जब किशोर अवस्था में अपने साथियों के साथ राजस्थान के जंगलों में शिकार करने के लिए गए थे, तब उन्होंने जंगल में संत गुरू गोरखनाथ को ध्यान में बैठे हुए पाया। बप्पा रावल ने संत के नजदीक ही रहना शुरू कर दिया और उनकी सेवा करते रहे। गोरखनाथ जी जब ध्यान से जागे तो बप्पा की सेवा से खुश होकर उन्हें एक तलवार दी जिसके बल पर ही चित्तौड़ राज्य की स्थापना हुई।

गोरखनाथ जी ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे राँझा ने गोरखनाथ से योग दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथ से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम गोरखनाथ जी के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ पर स्थित गोरखनाथ जी का मंदिर  आज भी दर्शनीय है।

गोरखनाथ जी से सम्बंधित एक कथा राजस्थान में बहुत प्रचलित है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ गोगामेडीश् के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रह�� है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की साथ आए  धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया। यहाँ सभी धर्मो के भक्तगण गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादौं (भाद्रपद) मास में उमड़ पडते हैं। इन्ही गोगाजी को आज जावरवीर गोगा कहते है और राजस्थान से लेकर विहार  और पश्चिम बंगाल तक इसके श्रद्धालु रहते हैं ।

आज भी हैं भोगी और योगीनाथ अस्तित्व
प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली दफे व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है।
परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे सिले कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को सींगी सेली कहते हैं।
इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर श्आदेशश् या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें बैरागी, उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं।

इन्हीं से आगे चलकर चौरासी और नवनाथ माने गए जो निम्न हैं-प्रारम्भिक दस नाथ………
आदिनाथ, आनंदिनाथ, करालानाथ, विकरालानाथ, महाकाल नाथ, काल भैरव नाथ, बटुक नाथ, भूतनाथ, वीरनाथ और श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ, वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुन नाथ।
चौरासी और नौ नाथ परम्परा

आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चैरासी मानी गई है।
नौनाथ गुरु  1.मच्छेंद्रनाथ 2.गोरखनाथ 3.जालंधरनाथ 4.नागेश नाथ 5.भारती नाथ 6.चर्पटी नाथ 7.कनीफ नाथ 8.गेहनी नाथ 9.रेवन नाथ। इसके अलावा ये भी हैं 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ 12.रामचंद्रनाथ। ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चैरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंरीनाथ और साईं बाब को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है क्या भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं।
नाथपंथ के दूसरे नाथों के नाम-
कपिल नाथ जी, सनक नाथ जी, लंक्नाथ रवें जी, सनातन नाथ जी, विचार नाथ जी , भ्रिथारी नाथ जी, चक्रनाथ जी, नरमी नाथ जी, रत्तन नाथ जी, श्रृंगेरी नाथ जी, सनंदन नाथ जी, निवृति नाथ जी, सनत कुमार जी, ज्वालेंद्र नाथ जी, सरस्वती नाथ जी, ब्राह्मी नाथ जी, प्रभुदेव नाथ जी, कनकी नाथ जी, धुन्धकर नाथ जी, नारद देव नाथ जी, मंजू नाथ जी, मानसी नाथ जी, वीर नाथ जी, हरिते नाथ जी, नागार्जुन नाथ जी, भुस्कई नाथ जी, मदर नाथ जी, गाहिनी नाथ जी, भूचर नाथ जी, हम्ब्ब नाथ जी, वक्र नाथ जी, चर्पट नाथ जी, बिलेश्याँ नाथ जी, कनिपा नाथ जी, बिर्बुंक नाथ जी, ज्ञानेश्वर नाथ जी, तारा नाथ जी, सुरानंद नाथ जी, सिद्ध बुध नाथ जी, भागे नाथ जी, पीपल नाथ जी, चंद्र नाथ जी, भद्र नाथ जी, एक नाथ जी, मानिक नाथ जी, गेहेल्लेअराव नाथ जी, काया नाथ जी, बाबा मस्त नाथ जी, यज्यावालाक्य नाथ जी, गौर नाथ जी, तिन्तिनी नाथ जी, दया नाथ जी, हवाई नाथ जी, दरिया नाथ जी, खेचर नाथ जी, घोड़ा कोलिपा नाथ जी, संजी नाथ जी, सुखदेव नाथ जी, अघोअद नाथ जी, देव नाथ जी, प्रकाश नाथ जी, कोर्ट नाथ जी, बालक नाथ जी, बाल्गुँदै नाथ जी, शबर नाथ जी, विरूपाक्ष नाथ जी, मल्लिका नाथ जी, गोपाल नाथ जी, लघाई नाथ जी, अलालम नाथ जी, सिद्ध पढ़ नाथ जी, आडबंग नाथ जी, गौरव नाथ जी, धीर नाथ जी, सहिरोबा नाथ जी, प्रोद्ध नाथ जी, गरीब नाथ जी, काल नाथ जी, धरम नाथ जी, मेरु नाथ जी, सिद्धासन नाथ जी, सूरत नाथ जी, मर्कंदय नाथ जी, मीन नाथ जी, काक्चंदी नाथ जी।

गुरु गोरखनाथ सचमुच ही महान योगी थे ! अगर भक्तिसिद्धान्तवादी सन्तों की माने तो वे साक्षात षिव के ही योगी रूप में अवतार थे जो विषुद्ध योग को प्रश्रय देते थे ! जिन सप्त चिरंजीवी लोगो मंे सन्तों की गणना होती है  उनमें एक गुरु गोरखनाथ को उनके अनुयायी आज भी जीवित अवस्था में मानते हैं आंैर कुछ श्रद्धालु अपने  शुभनाम के पीछे नाथ जरुर लगाते हैं । उत्तराखंड  तथा नेपालमें नाथपंथी साधुओ की वंसावली है जिनको कानफटा या  कानफडा साधु कहते और गेरुए लिबास मेे होते है और  ये सभी साधुसम्प्रदाय से दीक्षित होते है और इसके बावजूद स्त्रीसम्पर्क करते है और बिना विवाह संस्कार के किसी भीस्त्री  को मोहित करके या प्रेमजाल लाकर उसको अपने आश्रय में ले लेते है ! परन्तु इनको अघोरी नाथ भी कहते जिनको  भगवान बुद्ध के अनुयायी  भी कहा जाताहै ! वास्तव में मत्स्येन्दनाथ से उत्पन्न पारसनाथ और नीमनाथ ने  आगे चलकर ऐसे वामावार को नाथपन्थ में प्रवेष करा जहां साधु सन्त तंत्रसाधना के नाम कामपिपासा शान्त करने के लिए औरतों मे आसक्त होगये और नाथपंथ की ष्षक्ति योगसाधना की वजाय भोगसाधना में प्रवृत हो गई ! सभी प्रकार के शरीर के योगसाधन आदि भी गुरु गोरखनाथ की और उनके पूज्य गुरु मत्स्येन्द्र नाथ की देन है जिनकी प्राथमिक तंत्रसाधना और वामामार्ग की सि़द्धि के लिए अनिवार्य !  इन्हीं योगसाधनाओं के अनेक आसन करने के लिए योगगुरु रामदेव भी स्वास्थ्य रक्षा के लिए आम आदमी को प्रेरित करते है।

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Posted by admin - October 16, 2015 at 9:18 am

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Dev Puja – puja vidhi

देवपूजेमागचं शास्त्र

हिंदू धर्मामध्ये देवपूजेला अनन्यसाधारण महत्त्व असून देवपूजेचे वैयक्तिक अनेक फायदे आहेत. देवपूजेदरम्यान करण्यात येणाऱ्या प्रत्येक क्रियेमागे एक शास्त्र असून त्यामुळे आपलं शारीरिक, मानसिक आणि भावनिक आरोग्य चांगलं राहतं.

……….

आपल्या हिंदू धर्मामध्ये अऱ्हिकाचं महत्त्व आहे. त्यात स्नान, संध्या, पूजा हे सर्व कार्यक्रम जर रोज नेहमीच्या वेळेत ठेवलं तर अनेक चमत्कार घडून येतात आणि त्याचा आपल्या सर्वांगीण प्रगतीसाठी लाभ होत असल्याचं अनेक प्रयोगांमधून सिद्ध झालेलं आहे. देह हे ईश्वराचं मंदिर मानलेलं आहे. स्नान केल्यावर कपाळावर तिलक धारण करणं म्हणजे एक छोटी देवपूजा होय. तिलक धारण करण्यामागे आणखी एक कारण म्हणजे तो धारण करताना मध्यमेचा उपयोग करावा, असं शास्त्र सांगतं. मध्यमेचा संबंध हृदयाशी असल्यामुळे अंगुलीतून प्रवाहित होणारी स्पंदनं प्रत्यक्ष हृदयाला जाऊन भिडतात. यामुळे दिवसभर मनात भक्तिभाव आणि शांती नांदते. तिलक धारण करण्यापूवीर् काही वेळेला सर्वांगास भस्म लावण्याची पद्धत आहे. भस्मामध्ये दुर्गंधनाशक आणि मनाला उत्तेजक अशी संप्रेरक दव्य असतात. नियमित भस्म लेपण केल्यामुळे संधिवातासारख्या रोगांचा प्रादुर्भाव होत नाही. त्याचबरोबर अंगातील तेज आणि ओज यांचं जतन होतं. देवपूजा करताना पितांबरसारखं वस्त्र नेसण्याचा प्रघात आहे. यामध्ये रेशीम किंवा लोकरीचं वस्त्र अधिक लाभदायी ठरतं. कारण धामिर्क कार्याच्या वेळी मंत्रोच्चारातून निघणारी स्पंदनं आणि विद्युत लहरी त्वरीत अंगभर फिरवण्यासाठी अंगास घर्षण होणारी रेशमी किंवा लोकरी वस्त्रं अधिक उपयोगी पडतात. याशिवाय अशी वस्त्रं स्वच्छ करण्यासाठी सोपी असतात.

आसनाबद्दल धर्मग्रंथात विस्तृत चर्चा केलेली आहे. ज्या आसनावर बसून माणूस बौद्धिक, शारीरिक आणि मानसिक विकास करून घेतो त्याची वैज्ञानिकता पूर्णपणे सिद्ध झालेली आहे. विद्युतप्रवाहाच्या असंक्रामक आणि संक्रामक वस्तंुच्या तत्वावर प्राचीन ऋषीमुनींनी आसनासाठी विविध वस्तंुची योजना करण्यास सांगितलेलं आहे. गायीच्या शेणाने सारवलेली जमीन, कुशासन, मृगाजिन, व्याघ्रजिन, लोकरीचं कापड इत्यादी वस्तू असंक्रामक आहेत. अशा आसनावर बसून देवपूजा अथवा साधना केल्यास पृथ्वीतील विद्युतप्रवाह शरीरावर कोणताही अनिष्ट परिणाम करू शकत नाही. तसंच पाथिर्व विद्युतप्रवाहापासून आपलं संरक्षण होतं. त्याचबरोबर या आसनांच्या विशिष्ट प्रवाहामुळे सत्वगुणाचा विकास होतो. अंगातील तमोगुण वृत्ती आपोआप नष्ट होते. तसंच या आसनांवर दीर्घकाळ साधना करणाऱ्या व्यक्तीला मूळव्याध, भगेन्द इत्यादी प्रकारचे रोग होत नाही. साधना करत असताना अंगात निर्माण होणारी अतिरिक्त उर्जा आणि उष्णता यांचं निचरा होणं आवश्यक आहे. आवश्यक नसलेली पृथ्वीमधली उष्णता आणि उर्जा आपल्या अंगात संक्रमित होऊ न देणं महत्त्वाचं आहे. यासाठी लाकडी पाट वापरणं निषिद्ध ठरतं. कारण लाकूड हे मंदसंक्रामक आहे आणि लाकडी पाट वापरल्यास उजेर्चा निचरा होत नाही. यासाठी लोकरीसारख्या आसनामुळे पृथ्वीची आंतरिक उष्णता, उर्जा यांचा आपल्याला उपदव होत नाही.

नित्य अऱ्हिकामध्ये संध्या, पंचमहायज्ञ इत्यादीप्रमाणे देवपूजेलाही महत्त्वाचं स्थान आहे. व्यक्तिगत उत्कृष्ट संस्कारासाठी संध्या आणि अन्नावरील संस्कारासाठी पंचमहायज्ञ आणि घरातील वातावरण शुद्ध ठेवण्यासाठी देवपूजा अत्यंत आवश्यक असते. देवपूजेमध्ये प्रामुख्याने शुद्ध वातावरण निमिर्ती हा भाग असतो. देवपूजेपूवीर् घर आणि देवघर झाडून-लोटून स्वच्छ करणं, देवांची भांडी घासून-पुसून स्वच्छ ठेवणं, फुलं, उदबत्ती, नैवेद्य, निरांजन इत्यादी पूजेची तयारी करणं, देवासमोर रांगोळी घालणं ही वातावरणनिमिर्ती पूजेएवढीच महत्त्वाची आहे. देवपूजा करताना म्हणण्यात येणारी सूक्ते आणि मंत्रं वातावरण शुद्धी करतात. वैदिक मंत्र येत नसतील तर पूजा करताना येत असलेली प्राकृत स्त्रोत्रं किंवा नामावली मध्यम स्वरात अवश्य बोलावी. घरातली किंवा पाहुणे मंडळी या वातावरणामुळे भारावून जातात आणि त्यांच्या मनात एखादी वाईट भावना येत असेल तर ती नाहीशी होते. देवपूजेमुळे सामाजिक आणि कौटुंबिक लाभ प्राप्त होतात. देवपूजा करताना मनाची एकाग्रता, अवांतर विचारांचा विसर आणि इष्टदेवतेविषयी भक्तिभाव यामुळे पूजेनंतर मनाला अत्यंत अल्हाददायक आणि उल्हासदायक वाटतं. देवपूजा हा उत्कृष्ट मानसिक व्यायाम आहे. खास करून दररोज एका ठराविक वेळी पूजा केल्यास देवपूजेचा जास्तीत जास्त लाभ पूजार्कत्याला मिळतात.

देवपूजेमध्ये पंचगव्याचे अतिशय महत्त्व आहे. पंचगव्य म्हणजे गायीपासून उत्पन्न होणारे पदार्थ. यामध्ये गोमूत्र, गोमय, गोरस, गोदधी, गोघृत यांचा समावेश असतो. शरीरशुद्धी होण्यासाठी प्रथम पंचगव्याचं प्राशन करायचं असतं. त्याचबरोबर देवाची प्रतिमा आणि माळेचं पवित्रकरण करताना प्रथम त्यावर पंचगव्य प्रोक्षण करतात. ज्याप्रमाणे अग्नी इंधन नष्ट करतो, त्याचप्रमाणे देहात व्याधीरूपाने साचून राहिलेलं पाप पंचगव्याने नष्ट होतं. गोमूत्राच्या नित्य सेवनाने काही त्वचारोग समूळ नाहीसे होतात. तसंच काही अस्थीविकारांवर आणि काही यकृतसंबंधी व्याधींवर गोमूत्र आणि गायीचं दूध उपयुक्त ठरतं, असं आयुवेर्दात सांगितलेलं आहे.

पंचगव्याबरोबर पंचामृताचंही देवपूजेमध्ये महत्त्व आहे. पंचामृतात खडीसाखर, मध, तूप, दही आणि दूध या पाच वस्तुंचा समावेश होतो. यामध्ये मध हा अग्नीदिपक, नाडीशोधक, रक्तदोषनाशक, मलसारक, पुष्टीकारक, विषशोधक, त्रिदोषहारक असा आहे. तसंच खडीसाखर ही मधुर, स्निग्ध, वात-पित्त-कफहारक, दाहनाशक आहे. पंचामृत करताना साखर एक चमचा, मध दोन चमचे, तूप तीन चमचे, दही चार चमचे आणि दूध पाच चमचे असं प्रमाण घ्यावं. पंचामृत सेवनाने दिवसभरात झालेली शरीराची झीज भरून निघते.

देवपूजा करताना शंखनाद करणं ही एक प्रकारची कला आहे. दररोजच्या पूजेत आरतीची सुरुवात शंखनादाने अवश्य करावी. शंखनादामुळे आदिभौतिक आणि आदिदैविक पीडा संभवत नाही. कानात दडे बसून बहिरेपण आलेल्या, मानसिक संतुलन बिघडून भ्रमिष्ट झालेल्या, कानात चित्र-विचित्र आवाज होणाऱ्या तसंच विविध बाधा असणाऱ्या व्यक्तींच्या कानात शंखनाद केल्यास त्या व्यक्तीची प्रकृती सुधारत जाते.

मंदिरात किंवा देवपूजेमध्ये घंटानादाची प्रथा प्राचीन काळापासून आहे. घंटा हे मंगलमय पवित्र ध्वनीचं प्रतीक असून वातावरणामध्ये पवित्र भाव त्याने निर्माण होतो आणि मनाची एकाग्रता साधण्यास मदत होते. घंटानादातून ओंकाराची ध्वनी निमिर्ती होते. ध्वनीवर अलीकडे बरंच संशोधन चालू आहे. ज्या मातेच्या स्तनातून दूध येत नाही ते विशिष्ट परिणामांमुळे येऊ शकतं. जे रोपटं सहा महिन्यात फूल देतं ते रोपटं ध्वनिपरिणामामुळे दोन महिन्यात देऊ शकतं. पालेभाज्या, फळभाज्या यासुद्धा विशेष ध्वनीने प्रभावित होतात. घंटानादातून निर्माण होणाऱ्या ध्वनींमुळे २६ फूट परिघाच्या क्षेत्रात क्षयरोग, प्लेग, पटकी, विषमज्वराचे जंतू नष्ट होतात, असं १९१६ मध्ये जर्मनीतल्या बलिर्न विद्यापीठात संशोधन झालं आहे.

देवपूजेमधला पंधरावा उपचार म्हणजे प्रदक्षिणा. गणपतीला २१, विष्णूला ४, देवीला १, सूर्याला ७, मारूतीला ११ अशा प्रदक्षिणा घालतात. तर शिवाला अधीर् प्रदक्षिणा घालण्याची परंपरा आहे. पंचायतन पूजा घरीच करणाऱ्यांनी स्वत:भोवती एकच प्रदक्षिणा घालावी. आपल्या संस्कृतीमध्ये पुत्रप्राप्तीसाठी पिंपळाला किंवा देवळाला प्रदक्षिणा घालण्याची प्रथा आहे. संत ज्ञानेश्वरांच्या मातोश्रीने अश्वत्थाला दररोज १०८ प्रदक्षिणा १२ वर्षं घातल्याचं सर्वश्रुत आहेच. गर्भाची आतली गती ही प्रदक्षिणात्मक होत असते. प्रदक्षिणेमुळे सर्व शरीराला आणि शारीरिक क्रियांना अनुरूप अशी गती मिळते गर्भाशय आणि तत्संबंधी स्नायूंना चांगलं वळण लागतं आणि परिणाम टिकून राहतो. त्याचबरोबर एक महत्त्वाचा फायदा म्हणजे बद्धकोष्ठता, अजीर्णादी दूर होऊन शरीरातल्या वायूंना योग्य ती अनुलोम गती प्राप्त होते. मनोशारीरिक शुद्धी होते आणि सुप्तशक्ती जागी होऊन अध्यात्मिक प्रगती होते.

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Posted by admin - October 3, 2015 at 12:37 pm

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Om Namoji Aadya – D. K. Soman

ओम नमोजी आद्या

खगोलशास्त्रज्ञ आणि पंचागकर्ते दा. कृ. सोमण.

पृथ्वी, आप, तेज, वायू आणि आकाश यांना पंचमहाभूतं म्हणून ओळखतो. ही पाच शक्तीस्थानं आहेत. या पंचमहाशक्तींमध्येच श्रीगणेशाचं वास्तव्य आहे. या निसर्गाची उपासना करणं, पर्यावरण संवर्धन करणं म्हणजेच श्रीगणेशाची उपासना करणं होय. सर्वांच्या लाडक्या गणपती देवतेची षोडशोपचार पूजा कशी करावी याबद्दल सांगताहेत खगोलशास्त्रज्ञ आणि पंचागकर्ते दा. कृ. सोमण.

….

श्रीगणेश म्हणजे मूतिर्मंत ओमकार आहे. संत ज्ञानेश्वर म्हणतात –

”अकार चरणयुगुल।

उकार उदर विशाल।

मकार महामंडल।

मस्तकाकरे।।

हे तिन्ही एकवटले।

तेथे शब्दब्रह्मा कवळले।

ते मिया गुरूकृपा नमिले।

आदिबीज।।”

भगवद्गीतेत ओमकाराला ‘एकाक्षरी ब्रह्मा’ संबोधलं आहे. ‘ओम’ हा ध्वनी सर्व ब्रह्माांडाला व्यापून राहिला आहे. नादयोगामध्ये हा ध्वनी अत्यंत सूक्ष्म आणि प्रभावी असल्याचं म्हटलंय. मांडुक्य उपनिषदात ओमकार हा एकाक्षरी महामंत्र असल्याचं म्हटलं आहे. स्वामी विवेकानंदांनी ओमकार म्हणजे प्रत्यक्ष ईश्वर असं म्हटलंय. ओमकाराचा जप हीच खरी उपासना होय. ओम हे ब्रह्मा असून विश्वाची उत्पत्ती, स्थिती आणि लय त्याच्याच आश्रयाने सुरू असतात, असं तैत्तिरीय उपनिषदात म्हटलं आहे. अ + उ + म् +ॅ मिळून ओमकार बनतो. ओमकाराचे हे चार विभाग जागृती, स्वप्न, सुषुप्ती आणि तुर्या या चार अवस्थांचं तसंच विश्व, तैजस, प्राज्ञ आणि आत्मा अशा चार आत्मस्वरूपाचे निदर्शक म्हणून मानले गेले आहेत. तसंच ‘अ’कार विष्णू, ‘उ’कार महेश आणि ‘म’कार हा ब्रह्मा अशा तिन्ही देवतांचा ओमकारात समावेश केला आहे. ‘अ’कार विश्वाची व्याप्ती करतो. ‘उ’कार तेजाची आणि ‘म’कार ज्ञानाची व्याप्ती करतो. ‘ओम’लाच ‘प्रणव’ असंही म्हणतात.

पंचमहाशक्ती

पृथ्वी, आप, तेज, वायू आणि आकाश यांना आपण पंचमहाभूतं म्हणून ओळखतो. ही पाच शक्तिस्थानं आहेत. या पंचमहाशक्तींमध्येच श्रीगणेशाचं वास्तव्य आहे. या निसर्गाची उपासना म्हणजेच श्रीगणेश उपासना होय.

‘त्वं भूमि: रापोह्यनलो ह्यनिलोनभ:’

‘त्वं ब्रह्माात्वं विष्णुस्त्वं रूदस्त्वं इंदस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं चंदमास्त्वं ब्रह्माभूर्भुव: स्वरोम’ असं गजकऋषींनी अथर्वशीर्षस्तोत्रात म्हटलंय.

पंचमहाशक्ती म्हणजे साक्षात श्रीगणपती. म्हणूनच त्याची उपासना करणं म्हणजे या महाशक्तींची ओळख करणं. पर्यावरणाकडे लक्ष देणं होय.

१) पृथ्वी – पृथ्वी पंचमहाशक्तींमधली पहिली शक्ती आहे. प्रथ् म्हणजे विस्तार पावणं यावरून हा शब्द बनला आहे.

‘प्रथवे विस्तार याति इति’ यावरून जी विस्तार पावते ती पृथ्वी अशी व्याख्या करण्यात आली आहे. गंध हा पृथ्वीचा गुण आहे. ऋग्वेदात म्हटलं आहे-

स्योना पृथिवि भवा नृक्षरा निवेशनी।

यच्छा: न: शर्म सप्रथ:।।

‘हे पृथ्वी, तू आम्हाला प्रसन्न हो. तुझ्यापासून कोणालाच उपसर्ग पोचत नाही. तू आपल्या पृष्ठभागावर सर्वांचाच समावेश करतेस. तेव्हा तू आम्हास सौख्यातिशय प्राप्त करून दे.’ अथर्ववेदात पृथ्वीचे धनदात्री, दानकतीर् आणि देवस्वरूप असे वर्णन केलं आहे.

पृथ्वीमध्येच श्रीगणेश आहे. म्हणूनच भादपद शुक्ल चतुथीर्च्या दिवशी पाथिर्व म्हणजे पृथ्वीच्याच मातीची गणेशमूतीर् पूजावी असं सांगितलंय. पृथ्वी सुमारे ४.५४ अब्ज वर्षांपूवीर् निर्माण झाली असावी. पृथ्वी ३६५.२५६३६६ दिवसांत सूर्याभोवती दर सेकंदाला २९.७८३ कि.मी. या वेगाने एक प्रदक्षिणा पूर्ण करते. तसंच स्वत:भोवती २३ तास ५६ मिनिटं ४.०९८९०३६९१ सेकंदात एक प्रदक्षिणा पूर्ण करते. पृथ्वीचा विषुववृत्तावरचा व्यास १२,७५६.२ कि.मी. असून धृवीय व्यास १२७१३.६ कि.मी. आहे. पृथ्वीवरच्या जीवसृष्टीला लोकसंख्या वाढ, प्रदूषण, अण्वस्त्रं, एड्स यासारखे आजार, ओझोनला छिदं पडणं, वन्यप्राणी जीवन नष्ट होणं, जमिनीची धूप, कचरा, बेसुमार जंगलतोड, खनिज संपत्ती नष्ट होणं इत्यादी धोके आहेत. म्हणून पर्यावरणाकडे लक्ष देणं म्हणजेच श्रीगणेश उपासना होणार आहे.

२) आप (पाणी)- ‘आप’ म्हणजे जल, पाणी, ही वैदिक देवता आहे. जल आणि नदी यांना वैदिक आर्य ‘आप’ या नावाने ओळखत. ऋग्वेदात ‘आप’ देवतेबद्दल चार सूक्तंआहेत. इंद आपल्या वज्राने पाण्याला वाट करून देतो. तिथूनच पाणी वाहतं. आप हे शुद्ध, मधुर आणि निदोर्ष आहे. पाणी हे रोगनिवारक असून त्यामुळेच पृथ्वीवरची जीवसृष्टी निर्माण झाली, असं ऋग्वेदात म्हटलं आहे. पृथ्वीचा ७१ टक्के पृष्ठभाग हा सागराने व्यापलेला आहे.

आपो ज्योती रसोह्यमृतं ब्रह्मा भू:र्भुव:स्वरोम्।

या वचनाप्रमाणे वेदांमध्ये आप शब्दाचा प्रयोग ज्योती, रस, अमृत, ब्रह्मा, भूर्र्भव:स्व आणि ओम् या अथीर् होतो. पंचमहाभूतांमधली ही महत्त्वाची शक्ती आहे. त्यामध्ये श्रीगणेश आहेत. म्हणूनच गणेश मूतीर्चं विसर्जन पाण्यातच केलं जातं. ‘जलति जीवयति लोकानिति’ म्हणजेच लोकांना जगवते ते जल. श्रीगणेशाचा वास पाण्यात आहे. आधुनिक वैज्ञानिक भाषेत पाण्याला ।।२ह्र म्हणून ओळखलं जातं. शून्य अंश तापमानात पाण्याचं बर्फात रूपांतर होते तर ९९.९७४ अंश सेल्सिअस तापमानात पाण्याचं वाफेत रूपांतर होतं. भारतात लहान मोठ्या मिळून दोन हजार नद्या आहेत. त्यापैकी सिंधू(२९००कि.मी.), चिनाब (९६०कि.मी.), रावी (७२७कि.मी.), बियास(४६४ कि.मी.), सतलज (१३६० कि.मी.), गंगा (२५१० कि.मी.), गोमती (८०० कि.मी.), गंडक (६७५ कि.मी.), कोसी (५९० कि.मी.), दामोदर (६२५ कि.मी.), यमुना (१४३५ कि.मी.), ब्रह्मापुत्रा (२९०० कि.मी.), साबरमती (४१५ कि.मी.), मही (५३३ कि.मी.), चंबळ (१०४० कि.मी.), नर्मदा (१३१० कि.मी.), तापी (७०२ कि.मी.), महा (८५८ कि.मी.), गोदावरी (१४९८ कि.मी.), कृष्णा (१२८० कि.मी.), भीमा (८६७ कि.मी.), तुंगभदा (६४० कि.मी.), कावेरी (७६० कि.मी.) या नद्या प्रसिद्ध आहेत. दुदैर्वाने या नद्यांचं जतन केलं जात नाही. निर्माल्य, कचरा, कारखान्यांचं सांडपाणी यामुळे नद्यातलं पाणी अस्वच्छ होतं. पर्यावरणाकडे लक्ष दिलं जात नाही. भारतामध्ये जलप्रदूषण ही मोठी समस्या आहे. जलप्रदूषण न होऊ देणं हीच खरी गणेशाची उपासना आहे.

३) तेज (अग्नी, सूर्य)- तेज ही पंचमहाभूतांमधली महाशक्ती आहे. श्रीगणेशाचं ते एक रूप आहे ‘उष्णस्पर्शवत्तेज’ म्हणजे उष्ण, स्पर्श हा तेजाचा असाधारण धर्म आहे. शब्द, स्पर्श आणि सूर्य हे तेजाचे तीन गुण आहेत. तेज हे जगताचं मूलतत्त्व मानलं गेलं जातं. न्यायशास्त्रात तेज शुभ्र चकचकीत म्हटलंय. पण छांदोग्य उपनिषदात तेजाचा रंग तांबडा असल्याचं म्हटलं आहे. तेज हे ब्रह्मााचं प्रतीक आहे. अग्नी ही वैदिक देवता आहे. विस्तव हे अग्नीचं पाथिर्व रुप. ‘अङ्गति ऊर्ध्वं गच्छति इति’ म्हणजे वर जातो तो अग्नी. द्यु, अंतरिक्ष आणि पृथ्वी ही अग्नीची प्रमुख जन्मस्थानं आहेत. अग्नीला अर्पण केलेलं दव्य अधिक पवित्र होऊन देवांना पोहोचतं, या समजुतीमुळे यज्ञसंस्था उदय पावली.

सूर्य पृथ्वीपासून सरासरी १४९५९८००० किलोमीटर अंतरावर आहे. सूर्य सुमारे पाच अब्ज वर्षांपूवीर् निर्माण झाला असावा. सूर्यात हायड्रोजन आहे. त्याचं हेलियममध्ये रूपांतर होत असतं. सूर्याच्या पृष्ठभागावर ५५०० अंश सेल्सिअस तापमान आहे. सूर्य आकाशगंगेमधल्या केंदापासून २४००० ते २६००० प्रकाशवर्षं अंतरावर आहे. तो २२.५ ते २५ कोटी वर्षांमध्ये एका सेकंदाला २५१ किलोमीटर या वेगाने एक प्रदक्षिणा पूर्ण करतो. सूर्यावरची हायड्रोजनची अणुभट्टी अजून पाच अब्ज वर्षं चालू राहणार आहे. नंतर त्याचं ‘श्वेतखुजा’मध्ये रूपांतर होईल. पृथ्वीवासियांनी सौरऊजेर्चा जास्तीत जास्त वापर करायला हवा.

४) वायू – वायू एक वैदिक देवता आहे. वायूची उत्पत्ती विश्वपुरुषाच्या श्वासातून झाली, असं ऋग्वेदात म्हटलं आहे. वायू सुंदर, मनोगती आणि सहस्त्र नेत्रांचा आहे असंही ऋग्वेदात म्हटलं आहे. वायूमुळे पर्जन्याचं आगमन होतं. पुराणात वायूचा जन्म आकाशापासून झाल्याचं म्हटलं आहे. ‘स्पर्श’ हा वायूचा गुण आहे. ‘रूपरहित: स्पर्शवान वायु:’ म्हणजे ज्याला रूप नाही पण स्पर्श आहे तो वायू होय. शरीर प्राणवायूमुळे जिवंत राहतं. वायूशक्तीमध्ये श्रीगणेश आहे. आधुनिक काळात वायूपासून पवनचक्कीद्वारे विद्युतनिमिर्ती केली जाते. वायू हे एक चैतन्य आहे.

५) आकाश – आकाशाची उंची अमर्याद आहे. १३.७ अब्ज वर्षांपूवीर् हे विश्व एका महास्फोटातून निर्माण झालं. त्यावेळी वेळ (ञ्जढ्ढरूश्व), वस्तू (रून्ञ्जञ्जश्वक्र) आणि आकाश पोकळीची (स्क्कन्ष्टश्व) निमिर्ती झाली. पृथ्वीसभोतालचं वातावरण ६० ते ८० किलोमीटरपर्यंत आहे. या उंचीला ‘मिसॉस्फिअर’ म्हणतात. उल्कावर्षाव याच उंचीवर होतो. अवकाश संशोधनासाठी जे फुगे पाठवतात ते २० ते ४० किलोमीटर उंचीपर्यंत जातात. काँकर्ड विमानं या उंचीवर उड्डाण करतात. ८० ते १२० किलोमीटर उंचीपर्यंत ‘ऑरा’ म्हणजे ‘ध्रुवीय प्रकाश’ दिसतो. अवकाशयान २६० किलोमीटर उंचीवर जातं. कृत्रिम उपग्रह ३८० किलोमीटर उंचीवरही ठेवली जातात. भूस्थिर उपग्रह ३६ हजार किलोमीटर उंचीवर ठेवावा लागतो. असं हे अवकाश… पंचमहाभूतातली एक महाशक्ती. विशालकाय श्रीगणेश या आकाशातही आहे. मूतीर्मधल्या गणेशरूपाबरोबरच पंचमहाशक्तींमधलं गणेशरूप ओळखणं, पंचमहाशक्तीचं महत्त्व जाणून पर्यावरणाचं रक्षण करण्यासाठी कटिबद्ध होणं हीच मोठी गणेश उपासना असेल.

देवपूजेचा इतिहास

देवपूजा म्हणजे एखाद्या देवतेला श्रद्धायुक्त अंत:करणाने विधियुक्त केलेलं उपचार समर्पण.

‘तत्र पूजा नाम देवतोद्देशेन दव्य त्यागात्मकत्वाद्याग एव’

देवतेला उद्देशून दव्यत्याग केला जात असल्यामुळे पूजा म्हणजे यागच होय, अशी पूजेची व्याख्या केली जाते.

पूजा ही आर्य संस्कृतीला दविड संस्कृतीकडून मिळालेली देणगी आहे. आर्यांना ‘यजन’ म्हणजे यज्ञयाग माहीत होतं. परंतु ‘पूजन’ माहीत नव्हतं. वैदिक आर्य इंदादी देवांना आणि पृथ्वी, आग, तेज, वायू, आकाश या पंचमहाभूतांना प्रसन्न करून घेण्यासाठी समिधा, यव, पुरोडाश इत्यादी वस्तूंचं अग्निमध्ये हवन करत. परंतु या यज्ञ यागामध्ये पुष्प, पत्र, अक्षता, चंदन, धूप, दीप इत्यादी वस्तूंना मुळीच स्थान नव्हतं. ऋग्वेदामध्ये कुठेही ‘पूजा’ हा शब्द आढळत नाही. यासंबंधी सुनीतीकुमार चटजीर् यांनी अधिक संशोधन केलं आहे. त्यानुसार ‘पूजा’ हा शब्द आर्य भाषेतला नसून तो दविड भाषेतला आहे. दविडांमध्ये फुलांनी देवाधर्माचे कृत्य संपन्न करणं म्हणजे ‘पूजा’ होय. दविडांमध्ये ‘पू’चा अर्थ फूल असा आहे, आणि करणे या अथीर् चेय, होय, गेय, जेय हे धातू रूढ आहेत. पू अधिक गेय् किंवा पू अधिक जेय म्हणजे पुष्पकर्म करणं असा होतो. त्यावरूनच वेदोत्तर संस्कृत भाषेमध्ये पूज् हा धातू आणि पूजा हे नाम आलं असावं. आर्य आणि दविड यांनी एकमेकांच्या ज्या धामिर्क गोष्टी स्वीकारल्या त्यामध्ये दविडी लोकांची पूजापद्धती आर्यांनी स्वीकारली असावी.

ऋग्वेदात ‘पूजा’ हा शब्द कुठेही आढळत नाही. महाभारतकाळी मात्र पूजेला यज्ञकर्माबरोबरच प्रतिष्ठा प्राप्त झाली होती. गीतेमध्ये भगवान श्रीकृष्ण म्हणतात- ‘मी सर्व यज्ञांचा भोक्ता आहे. पण त्याबरोबर पत्र, पुष्प, फल तोय हे पूजोपचारही मला आवडतात.’ पुराणांनी पूजेचे माहात्म्य आणि तपशील या दोन्ही गोष्टी वाढवल्या.

बौद्ध धर्माच्या उत्कर्षकाळात यज्ञसंस्था कमी होत गेली आणि त्या जागी देवपूजा अधिक रूढ होऊ लागली. यज्ञयाग पद्धत जास्त क्लीष्ट होती, तर पूजापद्धती जास्त सुलभ आणि कलापूर्ण होती. यज्ञयाग हे विशिष्ट लोकांनाच माहीत होते. परंतु पूजा अबालवृद्ध, स्त्री, पुरूष अशा कोणालाही करता येत होती. त्यानंतर स्मृतिकाळात तर पूजा हे प्रत्येकाचं कर्तव्यच मानलं गेलं. यज्ञयागातल्या देवदेवता अमूर्त होत्या. पण देवपूजेत प्रत्यक्ष मूतीर् असल्याने पूजकाला आधिक समाधान मिळू लागलं. पूजाही केवळ मूतीर्ंचीच राहिली नाही. गुरू, आचार्य, माता, पिता, अतिथी, संत, महात्मे इत्यादींचाही पूजेने सन्मान केला जाऊ लागला.

षोडशोपचार पूजा

त्यानंतर देवपूजेमध्ये षोडशोपचार पूजेचं महत्व आलं.

१. आवाहन

२. आसन

३. पाद्य

४. अर्घ्य

५. आचमन

६. स्नान

७. वस्त्र

८. यज्ञोपवीत

९. गंध

१०. पुष्प

११. धूप

१२. दीप

१३. नैवेद्य

१४. नमस्कार

१५. प्रदक्षिणा

आणि १६. मंत्रपुष्प

हे षोडशोपचार पूजेमध्ये अर्पण केलं जाऊ लागलं. या उपचारांच्या बाबतीतही विकल्प सांगितलेले आहेत. त्यामुळे पूजापद्धती अधिक सुलभ झाली. या उपचारांच्या मागेही एक संकल्पना होती.

पुष्पाभावे फलं शस्तं फलाभावे तु पल्लवम्।

पल्लवस्थाप्यभावे तु सलिलं ग्राह्यमिष्यते।

पुष्पाद्यसम्भवे देवं पूजयेत्सिततण्डुलै:।।

फूल न मिळाल्यास फळ, ते न मिळाल्यास पाने, तीही न मिळाल्यास पाणी आणि तेही न मिळाल्यास शुभ्र म्हणजे धुतलेल्या तांदळांनी म्हणजेच अक्षतानी देवांची पूजा करावी.

१) आवाहन – अक्षता वाहून देवाला आवाहन केलं जातं.

२) आसन – हा उपचार समपिर्त करताना देवतेच्या बैठकीखाली अक्षता किंवा पाच फुले ठेवतात. विष्णूच्या आसनाखली तुळशीची पानं ठेवतात.

३) पाद्य – पाद्य उपचार मूतीर्च्या पायांवर फुलाने पाणी शिंपडून अर्पण केला जातो.

४) अर्घ्य – गंधमिश्रित पाणी फुलाने मूतीर्वर शिंपडतात. अर्घ्यासाठी पाण्यात दही, अक्षता, कुशाग्रे, दूध, दूर्वा, मध, यव आणि पांढरी मोहरीही घालतात.

५) आचमन – देवाला पिण्यासाठी आणि चूळ भरण्यासाठी पाणी देण्यालाच ‘आचमन’ म्हणतात. त्यासाठी पळीत पाणी घेऊन फुलाने चार वेळा मूतीर्वर शिंपडतात. या पाण्यात लवंग, वेलदोडा, वाळा, कंकोळही घालतात.

६) स्नान – यासाठी पळीत पाणी घेऊन दूर्वांनी किंवा फुलांनी ते मूतीर्च्या अंगावर शिंपडतात. तेल, उटणे इत्यादीनी अभ्यंग घालून उष्णोदकाने स्नान घालतात. पंचामृत स्नानासाठी दूध, दही, तूप, मध आणि साखर यांचा वापर करतात.

७) वस्त्र – कापसाचं वस्त्र देवाला अर्पण करतात.

८) यज्ञोपवीत – पुरुष देवतांना यज्ञोपवीत (जानवे) अर्पण करतात.

९) गंध – देवाला चंदन, कस्तुरी, कापूर, कुंकू आणि जायफळ लेप लावतात.

१०) पुष्प – गणपतीला लाल पुष्प प्रिय आहे. विष्णूला चंपक, मालती, कुंद व जाईची फुले आवडतात. शंकराला रुई, करवीर, दोण, कुश, धोतरा, नीलकमल प्रिय आहे.

११) धूप – सुगंधी व मन प्रसन्न करणारा असावा. धूपासाठी चंदन, गुग्गुळ, राळ, जटामांसी इत्यादी सुवासिक पदार्थ वापरतात.

१२) दीप – तुपाचा व तिळाच्या तेलाचा दिवा प्रशस्त आहे. निरांजनात तूप आणि फुलवात घालून ते प्रज्वलित करून ओवाळतात.

१३) नैवेद्य – आपण जे अन्न खातो ते देवाला नैवेद्यासाठी चालतं. नैवेद्य दाखवताना खाली चौकोनी मंडल करून त्यावर नैवेद्य ठेवतात. ‘प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा, ब्रह्माणे स्वाहा’ असं म्हणून ‘मध्ये पानीय’ म्हणून नंतर प्राणाय स्वाहा इत्यादी मंत्र म्हणतात.

१४) नमस्कार – देवापुढे नम्र होऊन साष्टांग नमस्कार घालतात.

१५) प्रदक्षिणा – देवाभोवती प्रदक्षिणा घालतात. शक्य नसेल तर स्वत:भोवती फिरवून प्रदक्षिणा घालतात.

१६) मंत्रपुष्प – मंत्रपुष्प अर्पण करतात.

………..

चौकट

देवतांची वाहनं

शंकराचं वाहन नंदी, विष्णूचं गरूड, देवीचं सिंह, सरस्वतीचं मोर किंवा हंस, गणपतीचं उंदीर अशी वाहनं सांगण्यात आली आहेत. या देवतांची ही वाहनं का आहेत, त्यांच्या कथाही सांगण्यात आलेल्या आहेत.

गणेशप्रिय पत्री :

१) मधुमालती (संस्कृत नाव- मालती): या वनस्पतीची वेल असते. या वेलीत टॅनिन असतं. तसंच त्यात हिप्टॅजीन हे ग्लुकोसाइड आढळतं. संधिवात, खरुज यावर हे औषधी आहे. हे कृमिनाशकही आहे.

२) माका – (संस्कृत नाव- ‘भृजंगराज’): माका जमिनीशी सरपट वाढणारी छोटी वनस्पती. माका कडू, उष्ण, डोळे आणि दात यांना चांगली तसंच केशरंजक असतो. कफ, वायू, खोकला, दमा, कृमी, हृद्रोग, विष, डोकेदुखी इत्यादींवर माका उपयुक्त असतो.

३) बेल- (संस्कृत नाव-बिल्व) आयुवेर्दात आव, बहिरेपणा, घसादुखी, अतिसार, आम्लपित्त, ज्वर, तोंडात फोड आल्यास बेल उपयुक्त असल्याचं सांगितलं आहे.

४) पांढऱ्या दुर्वा -(संस्कृत नाव- श्वेत दुर्वा) उचकी, ओकारी, ज्वर यावर औषधी.

५) बार -(संस्कृत नाव-बदरी) आयुवेर्दात आवाज बसल्यास, रक्तानिसार, घटसर्प, ओकारी यावर औषधी म्हणून सांगितलं आहे.

६) धोतरा -(संस्कृत नाव-धत्तूर) नखुरडे, दमा व फुफुसांचे विकार, खोकला, अर्धांगवायू यावर औषधी आहे. धोतरा विषारी आहे. याचा वापर वैद्यांच्या सल्ल्यानुसार करावा.

७) तुळस – ( संस्कृत नाव- तुलसी) खोकला, कर्णशूळ, टाइफॉइड, रक्तस्त्राव थांबवण्यास, त्वचा टवटवीत दिसण्यास उपयुक्त आहे.

८) शमी- (संस्कृत नाव- शमी, सवदंड) नखदंतविष, प्रमेह, गरमीवर ही उपयुक्त आहे.

९) आघाडा – (संस्कृत नाव- अपामार्ग) विंचवाचे विष, कुत्र्याचे विष, दातदुखी, कर्णबधीरता, रातांधळेपणा, मूळव्याध, कावीळ यावर औषधी आहे.

१०) डोरली – (संस्कृत नाव- बृहती, वार्ताकी) खोकला, विषबाधा इत्यादीवर ही औषधी आहे.

११) कण्हेर -(संस्कृत नाव- करवीर) विषबाधा, ताप, मूळव्याधीवर ही औषधी आहे.

१२) रुई -(संस्कृत नाव- अर्क) खोकला, कावीळ, अर्धशिशी, कानदुखीवर ही औषधी आहे.

१३) अर्जुन – जखम भरून येण्यास, अस्थिभंग, हृद्रोग, रक्तानिसार, जखम भरून येण्यावर ही उपयुक्त ठरतं.

१४) विष्णुक्रांत – ही वेल आकर्षक दिसते. मूळव्याध, कावीळ, पुटकुळ्या यावर ही औषधी आहे.

१५) डाळिंब – (संस्कृत नाव- दादिम) खोकल्यावर, अतिसारावर, डोळे येण्यावर औषधी आहे.

१६) देवदारा – (संस्कृत नाव- देवदारू) छातीत दुखणं, गंडमाळा इत्यादीवर ही वनस्पती औषधी आहे.

१७) पांढरा मारवा – (संस्कृत नाव- मरूबक) गरमी, अंगाचा दाह, ऱ्हद रोग यावर ही औषधी वनस्पती आहे.

१८) पिंपळ – (संस्कृत नाव-अश्वत्थ) उचकी, वांती, गरमी, तोंडात येणारे फोड, दमा, खोकला इत्यादीवर ही वनस्पती औषधी आहे.

१९) जाई – (संस्कृत नाव-जाति) कानदुखी, ओकारी, जखमा, टक्कल, ताप, खरूज यावर उपयुक्त आहे.

२०) केवडा – (संस्कृत नाव- केतकी) गरमी, रक्तप्रदर, चक्कर, डोकेदुखी इत्यादीवर उपयुक्त आहे.

२१) अगस्ती – (संस्कृत नाव- अगस्त्य) अर्धाशिशी, कफ, चक्कर, वातविकार यावर उपयुक्त.

या सर्व वनस्पतींचा वापर हा जाणकार वैद्यांच्या सल्ल्यानुसारच करावा. या वनस्पती औषधी असल्यामुळेच त्या गणेशाला प्रिय आहेत.

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Posted by admin - October 3, 2015 at 12:33 pm

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Posted by admin - October 3, 2015 at 10:24 am

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Free handwriting analysis

 

Imagine how exciting it would be if you could know anything about a person just by looking at their hand writing and signatur Graphology is the science of understanding the human subconscious mind through handwriting. It is the study of a person’s character through the medium of his handwriting and signature.Milind J Rajore is a practicing graphologist, who has taught this fascinating science to more than 15,000 people from all walks of life. He is the author of eight books on graphology and on the faculty of a law college in Pune. He has been actively involved in consulting services using handwriting analysis for detecting crime for police officials, helping companies recruit the right candidates, helping bank officials detect signa ture frauds, logo designing for companies etc.

A free handwriting analysis and introductory lecture will be held on October 4.

Jai Hind College, ` A’ Road, Near Churchgate Station, 10:30 am to 12:30 pm.

AOTS Alumni Association of Western India, 301-A, 3rd Floor, India Printing House, 42 G D Ambedkar Marg, Wadala, 3 pm to 5 pm.

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E-mail: igpspune@yahoo.com http://www.mjrajore.com (*Subject discussed is based on the expert’s understanding of the said field)

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Posted by admin - October 3, 2015 at 10:20 am

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What helps bring positive energy into the home and ban negative/dark energy?

How to bring positive energy into your home

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How to bring positive energy into your home
You cannot see energy with the naked eye but you can certainly feel it. Your home is an extension of your body and spirit. House blessing is an ancient tradition that invites positive energy into your home. So, if you are moving into a new home or just updating your current space, you can actually consider setting up your place to attract more positive energy.

What types of energies are there in our houses?

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What types of energies are there in our houses?
Energy is a term used to describe all the different levels of vibrations that effect us consciously or unconsciously. Physical Energy is one category of energy vibration. The red leather couch actually has a very different vibration composition than the yellow fabric couch, and the difference affects our energy field. The red couch offers a solid rooted sense to a person and allows them additional grounding. The yellow couch will offer a more expanded and unlimited sense of thoughts.

Emotional energy

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Emotional energy
Emotional energy is another type of energetic vibration. There is emotional dust that is unseen by the eye, but exists in every home. Clearing your house once a month with sage will absorb the extra emotional vibrations allowing for everyone to have more space to express themselves safely.

Psychic energy

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    Psychic energy
Psychic energy is another form of energy vibration that exists in a home. There is an energy grid on the earth and an energy grid in the air which runs through each of our houses. Depending on the location and “openness” of the house or the people who live there, there may be unhealthy psychic vibrations running through the house. This grid mapping of a home and its energy fields can be done by a number of intuitive professionals.

Electromagnetic radiation

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Electromagnetic radiation
Electromagnetic radiation vibrations are a huge hazard in our houses these days. They are extremely unhealthy. Do not have a cell phone or computer in your bedroom. The electromagnetic field from these devices causes ionizing and non-ionizing radiation. What does that mean? In short, these devices emit frequency that will cause the breakdown of the natural chemical bonds in our bodies.

Start attracting positive energy

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Start attracting positive energy
Based on the idea that your living space reflects your life, there are many age-old sciences that help us achieve a balance. Your home should be your sanctuary where you can feel nurtured, energized and fulfilled. Your space reflects and affects your inner life. If you bless your home and lavish it with love, it becomes a gracious holder of your dreams. So, what are you waiting for? Go ahead and imbue your space with love, harmony, health, happiness, and prosperity with these simple ideas…

Get close to nature

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Get close to nature
Nature creates a sense of peace. In fact, viewing nature reduces anger and anxiety and enhances feelings of pleasure. So flood your home with natural light, open windows and doors to let fresh air inside, and bring plants indoors. Decorate with bamboo, wood, or wicker, and use stones and rocks to add texture. You can also adorn the walls with paintings of nature and its serenity.

De-clutter every room

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De-clutter every room
This is absolutely fundamental to ensuring a harmonious home and life. Clutter in the home restricts the flow of positive energy, and can result in cluttered thinking. Having a tidy, organized home will result in feelings of calm and relaxation. Anything that is broken, unused, or brings back unhappy memories should be thrown away.

Meditate

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Meditate
A proper meditation once or twice a day in your living space will broadcast a powerful positive vibration. A broadcast from a meditative state of mind becomes much more powerful than it would otherwise be, making positive energy more powerful than negative energy. A proper meditation will saturate a space with uplifting energy for several hours.

The power of colours

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The power of colours
Colour choices play a big role in your home’s energy. Black, while stylish can actually attract and hold negative energy if used in too large a quantity. You don’t need to get rid of your black items, just be sure to balance them out with other bright and cheerful colours. White is one of the best colors to attract positive energy. If you think of white light, it actually contains all the colours of the rainbow when seen through a prism. This makes the colour white very powerful.

The power of colours

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The power of colours
However, too much white can feel overwhelming so be sure to balance it out with some other colours. Earth tone colors are especially nice to bring in some grounding and centering energy. The major colors of the rainbow can also help with positive vibrations in the home. Each colour has unique aspects, so including more of that colour in your home can help draw that energy in.

Kitchen space

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Kitchen space
Kitchen is the symbol of prosperity – and should be ideally placed in the south east. Kitchen in the north or north east may bring financial and health problems. In this case hang three bronze bowls upside down on the ceiling but do not hang over the stove.

Use mirrors wisely

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Use mirrors wisely
Mirrors reflect energy, so position them in places where you want to increase energy flow. Also, make sure that mirrors reflect something beautiful. You don’t want mirrors to reflect anything low energy or negative, like kitchen trash cans. Think twice before adding mirrors to your bedroom decor. They can energize the room which is not so great for getting enough sleep.

Balance the elements

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Balance the elements
Make sure you have something representing the five elements – wood, earth, metal, fire, and water – in every room of your house. The goal is to stay grounded, centered, and balanced in your life and your environment. For example, place a wooden bowl filled with stone pebbles alongside a candle and a vase of flowers. Or try to incorporate colors that symbolize the five elements: Black = water; Green = wood; Red = fire; Yellow, tan, and brown = earth; White = metal.

Open the front door

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Open the front door
Energy flows through the front door. An open and inviting pathway allows positive energy to flow into your home, whereas energy can stagnate if the entryway is closed off. Want opportunity to come knocking? Place a red-flowering plant outside or put some red accent colors on or around your front door. Red attracts energy, fortune, and luck.

Water bowl with Flowers

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Water bowl with Flowers
Bowl filled with water, flowers or lemon kept facing the main door is considered auspicious. Make sure to change the water regularly.

Bowl filled with sea salts

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Bowl filled with sea salts
Salt is considered a symbol of purification. It is also a popular mineral used to cleanse and purify homes filled with negative energy. Sea salt is commonly used to get rid of negative energy and to allow balanced flow of energy inside the home. The sea salt is either used alone or mixed with water and placed in certain areas of the home.

Bowl filled with sea salts

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Bowl filled with sea salts
A bowl filled with sea salt should be kept facing the North-East and South-West directions in an open pot. Epsom salt pot is the best way to get rid of stressful feelings and negative energy from home. A bowl half-filled with rock salt and water can also be kept in the hall. Some people believe that whenever a large amount of granules of salt appear to build on the edges of the bowl, it indicates the existence of negative energy at home.

Stop runaway energy

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 Stop runaway energy
You can’t benefit from the positive energies that flow through your front door if they zoom right out the back door. If you open the front door and there’s a direct line to the back door or a window, that’s runaway chi. You can stop runaway chi by placing furniture or some other decorative object in or near the questionable path and by using rugs to impede energy flow. Hanging a room separator or a faceted crystal near one of the doors will also help.

Position of furniture

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Position of furniture
Furniture should be positioned so as not to restrict free passage through the room, as this is a reflection of the flowing of energy. People should be able to sit with their backs to a wall whenever possible.

Make repairs promptly

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Make repairs promptly
Any house features such as stairs, doors or windows that are broken or not working restrict the flow of positive energy. Repairs should be made as quickly as possible to allow the energy to flow freely again.

Use scents

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Use scents
Scent is a wonderful way to bring positive energy into your space. Fill your home with the soothing aroma of incense and scented candles. You can also use scented oils to fill your home with your favorite scents. Cedarwood, citronella and cinnamon are all good for purifying the home. Lavender and eucalyptus are both good scents to promote healing and purification.

Use scents

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Use scents
You can use whatever scents appeal to you and lift your spirits. Try a variety of scents to find those that resonate best with your emotions. If you prefer not to burn candles for safety reasons, purchase an electric candle warmer instead. Plug it in and as the candle wax warms, the house will be filled with the scent of the candle.

Adopting pets

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Adopting pets
How you feel when you see any cute lovely pet like dog, puppies and cat running here and there or touching your leg or playing with you after you coming with lot of stress from outside? It definitely makes you smile, quickly increase happiness and awesomeness. Pets increase positivity quickly. God sent animals to help us, for our survival and for our happiness. If you don’t have any pet, buy one and spend a few minutes with them daily, you will feel disaster change in your family and home.

Using candles

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Using candles
Candles emit positive energy and convey to the universe your intentions. Below you will find a list of colors and what they attract. Black candles serve to dissolve the negative energies, however; black should always be burned with another color in order to bring forth balance.

Sound energy

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Sound energy
Sound energy is a physical form of energy that moves as a vibrational transmission through matter. Sound loops of a gentle rainfall, waves lapping the shore, an easy breeze through leaves and trees, and a burbling stream (similar to an indoor fountain) are wonderfully calming. You can add other design elements to your home in the form of a sound system, wind chimes, playing musical instruments, drumming, ringing bells, or singing to enhance your home’s sound energy.

Our thoughts are the energy

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Our thoughts are the energy
Positive thoughts will attract more of the same, but if you find yourself constantly judging your own behaviour and self criticising, this non-beneficial energy will then affect you and those around you. The thoughts running through our minds daily about ourselves then become our life’s intention. So think positive!

Put yourself in the power position

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Put yourself in the power position
When you lie in bed, sit at your desk, and relax in your favorite chair, make sure you can see the entrance to the room. Having your back to the doorway leaves an unsettling feeling, like you’re not protected. Position yourself so you won’t be startled when someone enters. The only exception to this is the placement of your bed. Do not have your feet directly in line with the door of your bedroom.

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Posted by admin - May 12, 2015 at 7:12 am

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BARACK OBAMA’S HANDS OF GOOD LUCK

BARACK OBAMA’S HANDS OF GOOD LUCK:

Taken from the White House Photo Blog – Barack Obama carries for good luck various things including: a bracelet belonging to a soldier deployed in Iraq, a gambler’s lucky chit, a tiny monkey god and a tiny Madonna and child.

Barak Obama's hands of good luck.

monkeygod32 Controversial Murti hanuman

obama hanuman monkey god

obama hanuman monkey god

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Posted by admin - February 7, 2015 at 10:59 am

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Symbols on palm and menaing

हाथों की उंगलियां एवं हथेली पर स्थित विभिन्न चिन्ह

palmistry

हमारे हाथ के अंगूठे के मूल में ब्रह्म तीर्थ होता है। ब्रह्म संबंधी तर्पणादि ब्रह्म क्षेत्र से ही करने चाहिए। तर्जनी एवं अंगूठे के मध्य में पितृ क्षेत्र होता है। अत: पितृ तर्पण कार्य तर्जनी एवं अंगूठे के मध्य से ही करने से पितृ तर्पण का पूरा फल मिलता है। करतल पर सभी देव एवं तीर्थ निवास करते हैं। हाथ के आगे लक्ष्मी, मध्य मे सरस्वती एवं मूल में ब्रह्म का निवास है। इसलिए हाथ देखने से पुण्य प्राप्त होता है एवं सुबह उठने के पश्चात सर्वप्रथम करतल के दर्शन करने से पुण्य फल मिलता है।

हाथों की उंगुलियां सरलता से मिलने पर जिसके हाथ में छिद्र नहीं रहता तो वह वह व्यक्ति अत्यंत भाग्यवान एवं सुखी होता है। छिद्रवान हाथ दरिद्रता का उपकारक है। तर्जनी एवं मध्यमा के मध्य में छेद न हो तो बाल्य अवस्था में सुखी होता है। मध्यमा एवं अनामिका में मध्य में छेद न हो तो युवावस्था में सुखी तथा अनामिका एवं कनिष्ठिका के मध्य छेद न होने पर वृदवस्था मे सुखी होता है।

हाथ की हथेली के रंग लाल होने पर व्यक्ति धनी होता है। पीत वर्ण होने पर धन की कमी होती है। यदि कराग्र भाग नीलवर्ण हो तो मध्यसेवी एवं दुखी जातक होता है। जिसके हाथ का मध्य भाग उन्नत हो तो वह परोपकारी होता है। करतल का मध्य भाग निम्न होने पर व्यक्ति पितृ धन से हीन होता है।

हाथ की हथेली में स्थित विभिन्न चिन्ह एवं उनके फल…

षट्कोण – जिसके हाथ में षटकोण का चिन्ह हो वह धनी एवं भूमिपति होता है।
शंख – शंख चिन्ह हथेली पर होने पर व्यक्ति समुद्र पर की यात्राएं करता है। विदेश गमन के व्यापार से धन कमाता है। धार्मिक विचारों वाला होता है।
स्वास्तिक – स्वास्तिक चिन्ह वाला व्यक्ति धनी, प्रतिष्ठित, धार्मिक यात्राएं करने वाला एवं वैभव सम्पन्न होता है।
त्रिकोण – भूमिपति, धनी एवं प्रतिष्ठित होता है।
छत्र – जिसके हाथ में छत्र का चिन्ह होता है वह राजा या राजा के समान होता है।
पद्म – धार्मिक, विजयी, राजा या राज वैभव सम्पन्न एवं शाक्तिशाली होता है।
चक्र – जिसके हाथ में चक्र के चिन्ह हो वह धनवान, वैभवशाली, सुंदर एवं ऐश्वर्यशाली होता है।
मछली – जिसके हाथ में दो मछलियों के चिन्ह हों, वह यज्ञकर्ता होता है।
कलश –जिसके हाथ में कलश का चिन्ह हो वह धर्म स्थानों की यात्रा करने वाला, विजयी एवं देव मंदिर का निर्माता होता है।
तलवार – जिसके हाथ में तलवार का चिन्ह हो वह भाग्यवान एवं राजाओं से सम्मानित होता है।
ध्वज – जिसके हाथ में ध्वज का निशान हो वह धार्मिक, कुलदीपक, यशस्वी एवं प्रतापी होता है।

MARKS ON THE HAND

transverse marksTransverse Marks

A transverse line marking on the hand is an evil sign that nullifies the positive qualities of any mount it is found upon. Though a person may have the markings of a heroic mount, these qualities can be reduced if it has a score of transverse lines. If transverse lines are found across the Mount of Mercury, it indicates that the bearer will use his/her talents of diplomacy and tact for deceit and guile for ill gains.

vertical marks Vertical Marks Vertical markings are a benefic sign. If found on the mounts, they heighten its positive qualities and assist in annulling any poor signs also located on the mount. They are the opposites of the aforementioned transverse markings. Vertical markings upon the Mount of Mercury will bring a great deal of tact and loquaciousness to serve for pleasant communication and friendship. It will emphasize science and business skills. Two vertical lines on the Mount of Mercury are often the symbol of a Doctor or Biologist.

grille lines The Grille

The grille is a point at which the energies of the hand dissipate or escape out. If grilles are found throughout the entirety of the hand, the power of its bearer is constantly drained by vexations and imagined slights. If a grille appears on the mount, it saps or thwarts the qualities of the mount, e.g. such a Grille on the Mount of Apollo will forever put off the attainment of any true success in life.

cross at palm The Cross

Crosses always denote troubles, disappointment, danger, and when found on lines, the harm to the bearer may be aggravated as the Holy Cross of Jesus Christ. Occasionally it can refer to a dramatic change in one’s life due to a crisis or hardship. They should always be considered an ill omen save for two cases: when found on the Mount of the Jupiter and when located between the Head and Heart lines, known as the “Croix Mystique”. The bearer of such a symbol is purported to possess a greater degree of mysticism, occultism, and superstition.The position of the “Croix Mystique” is also quite important. If located high up, near the Mount of Jupiter, the bearer will exhibit belief in mysticism only for their own gain. Those with crosses further from the Mount of Jupiter will care more for the principles and methods by which the mystical experience was expressed rather than its immediate application to themselves.

palm star The Star

The star is a symbol of good and sudden brilliance in a person’s life. A line that ends in a star signifies the greatest accomplishments possible; however, the star often carries with it an unpleasant price. For example if the Line of Apollo ends in a star, it denotes great fame, but this often results in the bearer suffering the loss of their private sphere to their successful public sphere.A star on the mounts will naturally denote great proficiency with the mount’s corresponding traits, yet these traits may consume some of the other bearer’s qualities. The star is certainly a sign to be viewed with great caution.

island The Island

The Island is always a negative sign. It is often a sign of some hereditary evil, such as a heart condition or intemperance with spirits, but it may just as easily represent non-congenital emotional stress. The island is a gradual and prolonged, and oft times subtle period of strife in an individual’s life. It could represent mounting stress on the line of the head, and manifest itself as headaches. On the Line of Fate, It could be a period in which the individual finds himself surrounded with mounting debts that peak at the widest point of the island.These misfortunes will last to the extent that the island is long.

palm square The Square

The square is almost always a benefic symbol. It denotes an especial significance when covering an area that is experiencing turmoil, such as chained, broken, or dotted lines. In this instance, difficulties will arise but the bearer will persevere and the crisis will be averted or thwarted. Damage may be reduced to a minimal one or prevented all together. A square after perturbations in a line signifies repair.The one instance in which the square denotes negative influences is when it is found on the upper portion of the Mount of Venus near the life line, where it denotes detention or incarceration.

palm circle The Circle

The circle is a very rare marking in palmistry. It is an evil mark unless it be on a mount, in which case it usually augments the powers and promise of a mount. If it touches any line, it brings inescapable misfortune to the line it touches.The native would go round and round in a circle without being able to break through and get free out of life’s hassles.

palm triangle The Triangle

The triangle is a positive sign, though strong significance should be ascribed to it only when it stands as an independent mark, not composed of intersecting lines. It denotes mental flourish and success corresponding to the location of the mark, i.e., if it were to be found upon the Mount of Apollo, it would denote an artistic success. If found alongside a line, it will naturally take on significance dependent upon the line.The triangle will never reach the great heights of success,but it possesses balance and will not carry with it the backlash that so often accompanies the star.

palm spots The Spot

The spot is a sign of a distinct event or malady, though it often comes in groups that denote a chronic disorder. If found on a line, it typically signifies a temporary illness corresponding to the line, e.g., a spot on the Line of Head indicates some violence to the head or brain fever.

palm trident The Trident

The trident is a most propitious marking wherever it may lay. If it rises from a line, it will expound the qualities of that line and draw additional power from the mounts or lines that branch on either side head towards. If found on a mount, the trident carries with it great flourish of the properties of that mount in conjunction with its neighboring mounts. The trident is such a powerful symbol that it eclipses the star in beneficence.

palm tassel The Tassel

A tasseled line can oft be found at the end of the lifeline; as the individual weakens and deteriorates with age, so too does the line. Such is the case with the Line of Head, where it denotes a weakening of mental clarity and approaching senility or old age ; the Line of Heart with a deteriorating heart condition or emotional trauma that has left the individual very feeble and unstable.

droping offshoots Drooping Offshoots

Lines that droop from any larger line indicate a disappointment in life. Along the Line of Heart, it denotes disappointment in love or an unfortunate event in which the individual became too emotionally involved. Along the Line of Head, it may signify the obstruction of one’s ideals or disillusionment.

palm rising offshoots Rising Offshoots

Rising offshoots are the inverse of the drooping offshoots. They represent periods of sudden inspiration, fruition, and happiness. It will draw upon the qualities of the mount that it is directed to. For example, an offshoot springing from the Line of Head and nearing the Mount of Mercury is a sign of scientific prowess–perhaps an invention, or a discovery, or a synthesis of concepts that have long been drifting through the individual’s mind, but had hitherto been dissociated.

palm sisterlines Sister Lines

Sister lines support the line along which they follow. Some sister lines are quite common, such as the Line of Mars, which accompanies and strengthens the constitution denoted by the Line of Life; The Line of Apollo is a sister line for the Line of Fate, as it serves a similar function and accentuates the fulfillment one feels in the course of their career. Sister lines protect and heal lines that are broken, crooked, frayed, or side-by-side. Lest a line exist with several negative markings, sister lines will be the guiding hand that shall shield the bearer from the brunt of life’s assaults.

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Posted by admin - February 7, 2015 at 10:37 am

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Check your future wife nature through palmistry

उंगलियां देखकर चुनें जीवन संगिनी

Photo - उंगलियां देखकर चुनें जीवन संगिनी

अक्सर मर्द अपने लिए जीवनसाथी की तलाश करते वक्त रंग-रूप और हाइट में उलझकर रह जाते हैं। जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं, तो उनकी उंगलियों पर भी एक नज़र जरूर डाल लें। क्योंकि यही उंगलियां आपकी जीवन संगिनी के साथ आपके भविष्य के बारे में बताएंगी। आइए जानें, इन उंगलियों में कैसे छिपा है आपकी खुशहाली का राज-

यदि महिलाओं की उंगलियां गोल और लंबी हों तो ऐसी महिलाएं अपने और अपने पति के लिए भी बेहद सौभाग्यशाली मानी जाती हैं।
Photo - चिकनी, सीधी और गांठ रहित उंगलियां


चिकनी, सीधी और गांठ रहित उंगलियों का मतलब है कि ऐसी महिलाएं वैवाहिक जीवन के लिए अति उत्तम हैं।


Photo - उंगली के आगे का हिस्सा पतला हो तो


उंगली के आगे का हिस्सा पतला हो और सभी पोर एक समान हो तो इसे भी वैवाहिक सुख-शांति की नजर से बेहतर माना गया है।


Photo - उंगलियां छोटी हों तो

जिन महिलाओं की उंगलियां छोटी होती हैं, वे जरूरत से ज्यादा खर्चीली होती हैं। दोनों हाथों की उंगलियों को जोड़ने पर उनके बीच यदि खाली जगह दिख रहे हैं तो इसका मतलब भी उनका खर्चीला होना ही है। ऐसी महिलाओं का भविष्य काफी कठिनाइयों से भरा होता है।



Photo - उंगलियों में चार पर्व

महिलाओं की उंगलियों में तीन पर्व का होना भाग्यशाली होता है। लेकिन इसकी जगह यदि किसी की उंगलियों में चार पर्व यानी पोर हों और उंगलियां छोटी-छोटी हों, जिसपर मांस न हो तो वे महिलाएं पति के लिए और खुद के लिए भी भाग्यशाली नहीं होतीं।


Photo - हथेली के पीछे बाल हों तो

स्कंद पुराण में यह चर्चा की गई है कि यदि किसी महिला की हथेली के पीछे बाल हों तो संभल जाइए, क्योंकि ऐसी महिलाओं को अपने वैवाहिक जीवन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसी महिलाओं से शादी करने का मतलब है कि आप हमेशा तनावपूर्ण स्थिति के बीच रहेंगे।

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Posted by admin - February 7, 2015 at 10:32 am

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